चुनावी ढोल नगाड़ा….
चुनाव आया नहीं पार्टीयों का ढोल नगाडा बजाना शुरू हो गया
अपना अपना डफली अपना अपना राग सब सुनाने लगे हैं
खुद को बेहतर पार्टी बताने में
लगे हैं ।
पिछले चुनाव में जनता ने दिया है जिसे नकार।
फिर इस बार चुनावी वोट भुनाने में लगे हैं.
झूठ बोल बोल कर कांग्रेस पार्टी को हरा दिया
10 साल तक अवाम को जुमलों में उलझा दिया।
लगाकर सरकारी तोता लोगों को जेल पहुंचा दिया.
और अब चुनावी फसल काटने आ गए
अपने गठबंधन के साथ रेवड़ी बांटने आ गए
जिसने संघर्षों में अपनी जिंदगी गुजार दी।
जल जंगल जमीन बचाने हेतु जान लगा दी
हक – हकूक की लड़ाई में उम्र गुजार दी
आज अब उन भोले वाले लोगों को लुभाने में लगे हैं।
माँ – माटी मानुष को बहकाने में लगे हैं.
कौन आदिवासी मूलवासी की सुधि ले रहा है।
खुद उड़ रहा है हवाई जहाज में जनता को चप्पल नहीं नसीब
गरीबी बेरोजगारी की स्थित है अजीब
चुनावी बांड से करोड़ों रुपए जमा कर लिया पार्टीयों को जनता से चंदा लेने से महरूम किया
कौन झारखंड की धरती को लूटना चाहती है.
झारखंड की आवाम को चुनाव के बहाने बांटना चाह रही है.
यही वह डबल इंजन की सरकार है
छात्र किसान गरीब देश में फिर भी कितना लाचार है अधिकतर देश के सरकारी प्रतिष्ठान भी बीमार है।
देह पर धर्म का चोला. मुंह में आग चिंगारी का गोला. बाबा भोला भी यह नौटंकी देख हैरान हैं।
बैसाखी वाली सरकार चाहिए या जुमले वाली सरकार चाहिए?
प्रस्तुति::आर के प्रसाद

