ढलती उम्र और महंगाई का बोझ
कृति…रामकृष्ण प्रसाद कांके ब्लॉक रांची
उमरिया झिनी.झिनी बीती जाए रे
समय का पारा बढ़ता जाए रे
देख देख महंगाई बेरोजगारी गुजरिया का मन घबराए रे।
देखा था जो सपना सब टूट जाए रे
अपने ईस्ट मित्र सगे संबंधी छुटा जाए रे।
सब मिलने जुलने से न जाने क्यों कतरा है रे।
महंगाई बेरोजगारी का पहाड़ टूट कर आए रे
जीवन में संघर्ष बढ़ता ही जाए रे
पढ़ाई लिखाई दवाई कमाई अच्छा मिल ना पाए रे
जीवन का संघर्ष बढ़ता ही जाए रे
महंगाई बेरोजगारी गरीबी तिल तिल सताए रे
आदमी रोज मारे रोज मर्रे का आर्थिक बोझ उठा पाया ना रे
किसानों को,बेरोजगारों को आमदनी बढ़ाने का उपाय सूझ ना पाए रे
हार्दिक भोज से किसानों का कमर प्रतिदिन टूट जाए रे
शिक्षाविदों, राजनीतिक आकाओं, नीति नियंताओं
कुछ तो उपाय बताएं जी
आशीर्वाद यात्रा परिवर्तन यात्रा, निश्चय घोषणा का कुछ तो स्वाद चखाओ जी
घर धैर्य और धर्म की मत परीक्षा लेना जी
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