गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘लोकतंत्र का भविष्य’ पर मंथन, वक्ताओं ने कहा – लोक मजबूत होगा तभी तंत्र सार्थक बनेगा

भागलपुर। गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित ‘लोकतंत्र का भविष्य’ विषयक संगोष्ठी में बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लोकतंत्र की बदलती दिशा और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर गहन विमर्श किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रकाश चंद्र गुप्ता ने की, जबकि मंच पर मुख्य वक्ता थे।अंतर्राष्ट्रीय गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति डॉ. मनोज कुमार और तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलानुशासक डॉ. योगेंद्र। संचालन संजय कुमार ने किया, स्वागत ऐनुल होदा और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल ने किया।लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ रही हैं’ – डॉ. मनोज कुमार
अपने संबोधन में डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि लोकतंत्र ‘लोक’ और ‘तंत्र’ का संतुलन है, परंतु आज यह संतुलन बिगड़ता प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक उपलब्धियों पर गर्व तो किया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण हुआ है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में बढ़ती संसाधन-निर्भरता को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। डॉ. कुमार ने जोर देकर कहा – ‘गांधीजी ने भीख नहीं, कर्म की संस्कृति पर जोर दिया था। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब समाज सरकार पर आश्रित होने के बजाय सामूहिक विकास की दिशा में स्वयं पहल करेगा।’लोक कमजोर तो लोकतंत्र कमजोर’ – डॉ. योगेंद्र
डॉ. योगेंद्र ने वर्तमान सामाजिक-आर्थिक असमानता को लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि सीमित हाथों में संसाधनों का केंद्रीकरण और जनता की बढ़ती निर्भरता लोकतंत्र को खोखला कर रही है। उन्होंने स्थानीय स्वशासन की दुर्बल होती स्थिति पर चिंता जाहिर की और कहा कि गांधीजी जिस ग्राम स्वराज की कल्पना करते थे, वह आज हाशिये पर खड़ा है। ‘जब जनता ही मजबूर हो जाए, तब प्रतिनिधि भी तंत्र के दबाव में बंधक बन जाते हैं,’ उन्होंने कहा।प्रकाश चंद्र गुप्ता ने चुनावी राजनीति के वर्तमान स्वरूप पर कड़ा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जाति, धर्म और समुदाय आधारित वोट मांगने की प्रवृत्ति ने मुद्दों और विकास को पीछे धकेल दिया है। ‘लोकतंत्र को जीवित रखना है तो मुद्दों पर संघर्ष को फिर से केंद्र में लाना होगा,’ उन्होंने कहा।यह लोकतंत्र नहीं, वोट तंत्र है’ – उदय जी
उदय जी ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं सिर्फ मतदान तक सीमित हो गई हैं। सत्ता परिवर्तन ही लोकतंत्र नहीं, बल्कि जनता के हितों की रक्षा और सहभागिता ही सच्चा लोकतंत्र है।कार्यक्रम में मृदुला जी, महबूब आलम, मोहम्मद शाहबाज, अलका जी, सच्चिदानंद किरण, जीनी हामिदी, मिंटू कलाकार और डॉ. जयंत जलद सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी और समाजसेवी उपस्थित रहे, जिनमें प्रकाश चंद्र गुप्ता, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. योगेंद्र, अलका जी, महबूब आलम, सच्चिदानंद किरण, मोहम्मद शाहबाज, मोहम्मद काबुल, सलाम, मृदुला सिंह, उदय, सुनील अग्रवाल, डॉ. जयंत जलद और अन्य सहभागी शामिल थे। संगोष्ठी का समापन लोकतंत्र को अधिक सहभागी, संवेदनशील और जनकेंद्रित बनाने के संकल्प के साथ हुआ।

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