सीने से मासूम को चिपकाए ‘जियो बैग’ पर सो गया पिता… बाढ़ के बीच वायरल हुई तस्वीर ने पूछे कई सवाल

प्रदीप विद्रोही,भागलपुर: गंगा के रौद्र रूप के सामने इंसान की बेबसी की एक तस्वीर इन दिनों लोगों के दिलों को झकझोर रही है। जिला प्रशासन की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत और बचाव की तमाम व्यवस्थाएं किए जाने के दावे के बीच बीती रात वायरल हुई एक मार्मिक तस्वीर ने बाढ़ की जमीनी हकीकत को सामने ला दिया है।
जिला प्रशासन के अनुसार जिले में करीब 13 अंचल, 82 पंचायत, 269 गांव, 93,693 परिवार और तीन लाख 87 हजार आबादी बाढ़ से प्रभावित हैं। यह आंकड़ा प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है। वैसे सूबे की हालत भी बाढ़ ने तबाह कर के रख दिया है। प्रदेश के 14 जिलों में बाढ़ का कहर उफान पर है। 36 लाख लोग प्रभावित हैं। जबकि बिहार में औसत से 35 प्रतिशत कम बारिश हुई है। भागलपुर में 52 प्रतिशत कम बारिश। सात जिलों में हालत खराब है। फसलें जल रही हैं।
वायरल तस्वीर में एक बाढ़ पीड़ित पिता अपने दुधमुंहे बच्चे को सीने से लगाकर घुप्प अंधेरे में जियो बैग के सहारे रात गुजारता दिखाई दे रहा है। चारों तरफ पानी, सिर के ऊपर खुला आसमान और गोद में मासूम की जिंदगी की चिंता… यह दृश्य सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि बाढ़ के बीच जिंदगी और बेबसी की पूरी कहानी बयां कर रहा है।
बताया जा रहा है कि यह तस्वीर भागलपुर जिले के गंगा पार स्थित राघोपुर बांध यानी बाढ़ – कटाव प्रभावित इलाके की है। पिछले करीब एक पखवाड़े से गंगा का जलस्तर और उसकी विकराल धारा सैकड़ों ग्रामीणों के जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। जिन घरों में कभी चूल्हा जलता था, वहां अब पानी का कब्जा है। जिन खेतों में फसलें लहलहाती थीं, वे जलमग्न हैं। गांव की गलियां और रास्ते पानी में डूब चुके हैं। तटबंध, बांध के टूटने का सिलसिला जारी है। मदद के सारे सरकारी प्रयास नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं।
घर छूटा, खेत छूटा… अब ‘आसमान’ ही बना छत:
बाढ़ ने ग्रामीणों को मानो उनकी जड़ों से उखाड़ दिया है। कई परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षित ठिकाने की है। घर-द्वार से लेकर खेत-खलिहान तक पानी से लबालब हैं। ऐसे में लोग अपने परिवार और बच्चों को लेकर ऊंचे स्थानों, तटबंधों या राहत शिविरों की ओर जाने को मजबूर हैं।
वायरल तस्वीर में पिता का अपने मासूम बच्चे को सीने से लगाकर सोना इसी संघर्ष की सबसे मार्मिक तस्वीर बनकर सामने आया है। शायद पिता के पास बच्चे के लिए सुरक्षित बिस्तर नहीं था, लेकिन उसने अपनी बांहों को ही बच्चे की चादर और अपने सीने को उसका सहारा बना लिया। एक पिता की मजबूरी यह भी है कि वह खुद भीगकर रात काट सकता है, लेकिन अपने बच्चे को अकेला नहीं छोड़ सकता।
‘दो जून की रोटी’ भी बनी चुनौती:
बाढ़ सिर्फ घरों में पानी नहीं भरती, वह लोगों की रोजी-रोटी भी बहा ले जाती है। खेतों में पानी भरने के कारण खेती प्रभावित है। काम-धंधे ठप हैं। ऐसे में गरीब और दिहाड़ी मजदूर परिवारों के सामने भोजन का संकट भी गहराता जा रहा है।
जिन परिवारों के घरों में अनाज, चूल्हा और रोजमर्रा की जरूरत का सामान था, वे आज राहत और मदद की उम्मीद में हैं। दो जून की रोटी का इंतजाम करना भी कई परिवारों के लिए चुनौती बन गया है।
बाढ़ ने बना दिया खानाबदोश:
गंगा के लगातार बढ़ते प्रभाव ने ग्रामीणों को ऐसी जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिया है, जिसकी उन्होंने शायद कभी कल्पना भी नहीं की होगी। कल तक अपना घर ही उनका सबसे सुरक्षित ठिकाना था, आज वही घर पानी में डूबा हुआ है। किसी के लिए नाव ही रास्ता है तो किसी के लिए तटबंध ही ठिकाना। कोई जरूरी सामान लेकर सुरक्षित जगह की तलाश में है तो कोई अपने मवेशियों को बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।
इसी बीच दुधमुंहे बच्चे को सीने से लगाए जियो बैग पर सोते पिता की तस्वीर बाढ़ की भयावहता के बीच इंसानी संवेदना और मजबूरी का ऐसा दस्तावेज बन गई है, जिसे देखकर आंखें नम हो जाती हैं।
राहत की व्यवस्थाओं के बीच तस्वीर ने खड़े किए सवाल
जिला प्रशासन की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत और बचाव की विभिन्न व्यवस्थाएं की जा रही हैं। लेकिन वायरल तस्वीर यह सवाल जरूर छोड़ जाती है कि क्या हर जरूरतमंद परिवार तक राहत की सुविधा उसी समय और उसी रूप में पहुंच पा रही है, जब उसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है?
बाढ़ जैसी आपदा में प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और आम लोगों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। राहत सामग्री, भोजन, सुरक्षित आश्रय, पेयजल, दवा और बच्चों की जरूरतों तक पहुंच सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
क्योंकि बाढ़ का पानी उतर जाएगा। गंगा फिर अपनी सामान्य धारा में लौट आएगी। खेतों से पानी भी धीरे-धीरे निकल जाएगा। लेकिन जिस पिता ने अपने मासूम को सीने से लगाकर जियो बैग पर रात काटी है, उसकी वह रात शायद उसके जीवन की सबसे लंबी रातों में हमेशा याद रहेगी। यह तस्वीर सिर्फ एक बाढ़ पीड़ित पिता और उसके बच्चे की तस्वीर नहीं है। यह उस संघर्ष की तस्वीर है, जिसमें एक पिता के पास अपने बच्चे को बचाए रखने के लिए सिर्फ अपनी बाहें हैं और उम्मीद के नाम पर एक सुबह का इंतजार।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *