गंगा ने खोल दी विकास की पोल: विधायक के गांव में बह गया भ्रष्टाचार का पुल

भागलपुर। नवगछिया के इस्माइलपुर प्रखंड में गंगा इस बार सिर्फ पानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को बहा ले गई। छोटी परबत्ता पंचायत के विनोबा गांव में बुधवार को दोपहर बाद अचानक तेज धार ने कुछ ऐसा कहर बरपाया कि ग्रामीण कार्य विभाग के सारे दावे बह गए – साथ में बहा एक करोड़ों का पुलिया और 400 मीटर सड़क भी।

सड़क क्या थी, जैसे ताश का घर था और गंगा ने बस एक सांस में उड़ा दिया। अब विनोबा, बसगड़ा और लक्ष्मीनिया गांव के लोग ना प्रखंड मुख्यालय पहुंच सकते हैं, ना अस्पताल, ना स्कूल। करीब 5 हज़ार की आबादी जैसे बाढ़ में नहीं, बल्कि सरकारी उपेक्षा में डूबी हुई है।

सिस्टम’ बहा, लोग अब नावों के सहारे

इन गांवों के लोग अब निजी नावों के सहारे जान जोखिम में डालकर एक किनारे से दूसरे किनारे जा रहे हैं। कोई सरकारी नाव नहीं, कोई राहत नहीं – प्रशासन तो जैसे बहती गंगा में ‘हाथ धोने’ में ही लगा है।

जनता का सवाल: विकास गया कहां?

ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। उनका कहना है – ये पुलिया तो पहले दिन से ही कागज़ी विकास का नमूना थी। हल्का सा पानी आया और सब बह गया। करोड़ों खर्च करने का दावा था, मगर हकीकत में निकला सिर्फ बालू और भ्रष्टाचार।

अभियंता की संवेदनशील सफाई

मौके पर पहुंचे कनीय अभियंता मिहिर कुमार ने कहा, अभी पानी ज्यादा है, जैसे ही घटेगा, सड़क बना देंगे।
ग्रामीणों ने तंज कसते हुए पूछा – तो क्या पहले पानी बढ़ने का इंतज़ार किया गया था इसे बहाने के लिए?

विपक्षी सुर में जनप्रतिनिधि भी

जिला परिषद सदस्य विपिन मंडल ने कहा, हर साल गंगा किनारे की योजनाएं बह जाती हैं, क्योंकि ऊंचाई, मज़बूती, और तकनीकी मानक सिर्फ फाइलों में होते हैं। भ्रष्टाचार ही असली इंजीनियर है यहां।

विधायक के गांव में टूटा विकास

सबसे चौंकाने वाली बात – यह टूटी हुई पुलिया और सड़क सत्तारूढ़ विधायक नरेंद्र कुमार नीरज उर्फ गोपाल मंडल के अपने पैतृक गांव की है।
ग्रामीणों का कटाक्ष है – जब विधायक के गांव में ऐसी दुर्दशा है, तो बाकी इलाकों की क्या उम्मीद करें?

करोड़ों की योजना का हिसाब कौन देगा? गंगा की हर धार में योजनाएं क्यों बह जाती हैं? क्या हर साल जनता अपनी जान जोखिम में डालती रहेगी? और सबसे बड़ा सवाल – क्या यह केवल पानी का बहाव था, या व्यवस्था की बहादुरी का पर्दाफाश? गांव में गंगा का जलस्तर भले ही बढ़ा हो, मगर विश्वास का स्तर हर साल गिरता जा रहा है। सवाल उठते हैं – और जवाब अब नाव पर सवार होकर नहीं आएंगे, बल्कि सड़कों पर उतर कर मांगे जाएंगे।

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